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आज युनो घोषित अंतरराष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस

आज युनो घोषित अंतरराष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस.

साल १९९२मे ब्राजील के रियोडीजानेरो में संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा आयोजित पृथ्वी शिखर सम्मेलन में गहन विचार-विमर्श के बाद दुनिया के आदिवासियों को उनके संवैधानिक अधिकार और मानवीय मूल्य और उनकी ज्ञान परंपराओं और मानव सहित श्रुषठी पर रहते सभी जीवों की रक्षा हेतु प्रक्रुति का शोषण एवं हो रहें हनन रोकने और प्रक्रुती संरक्षण के लिए भोगवादी जीवन शैली त्याग कर स्वावलंबी आदिवासी संस्कृति और परंपराएं बरकरार रखना अनिवार्य है। बेनमून आदिवासी जीवन शैली के माध्यम से पुरीदुनिया को स्वावलंबी और स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।.

 

पृथ्वी परिषद के आयोजन के वक्त178 से अधिक देशों के प्रमुखों, अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों, बुद्धिजीवियों और आदिवासी कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में अंतरास्ट्रीय आदिवासी दिन मनाने की घोषणा की गई थी।.

 

छोटाउदपुर जिले के आदिवासी समाज के वालसिंहभाई राठवा का कहना है कि हम सभी जानते हैं कि दुनिया आज ग्लोबल वार्मिंग जैसी स्थिति से जूझ रही है और दुनिया का हर देश मानव सभ्यता के विलुप्त होने के साथ प्राकृतिक सुरक्षा के लिए लड़ रहा है। विकास के नाम पर प्रकृति के शोषण और दुरूपयोग के और भौतिक सुविधाओं का उन्माद में मानव जीवन सहित, पृथ्वी पर रहते सभी जीवों पर जोखिम खड़ा हो रहा है, या आधुनिक औद्योगिक विकास के नाम पर पूरे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता जा रहा है। पर्यावरण में अप्राकृतिक परिवर्तनों के कारण क्षति का स्तर बढ़ रहा है, जिससे अत्यधिक वर्षा, सूखा, भूकंप, भूस्खलन, तूफान, , अति ताप, अति-शीतलन, आदि हो रहा हैं यह पुरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन गया है।.

 

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कोरोना महामारी की उत्पत्ति वैश्विक भौतिक सुविधाओं के लिए प्रकृति का शोषण और दुरुपयोग है, और वर्तमान वैश्विक कोरोना महामारी ने दुनिया के लिए जल्द से जल्द जागने का अलार्म बजा दिया है। जब दुनिया भर के वैज्ञानिक, समाजशास्त्री और बुद्धिजीवी इस बारे में चिंतित होते जा रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित 9अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाने और एक वैचारिक आंदोलन शुरू किया है। प्रकृति सुरक्षा विश्व सुरक्षा के मंत्र के माध्यम से प्रकृति की रक्षा करना और एकता, आदिवासी पहचान, स्वाभिमान, आदिवासी संस्कृति और परंपराओं, आदिवासी जीवन शैली, इतिहास, आत्मनिर्भरता, सह-अस्तित्व, सहयोग, प्रकृति की सुरक्षा, मानव कल्याण की सुरक्षा और संपूर्ण जीवन की सुरक्षा के माध्यम से पुरीदुनिया को बचाना अनिवार्य हो गया है देश और दुनिया में प्रकृति संरक्षण और संरक्षण के लिए एक विश्वव्यापी अभियान छेड़ने की आवश्यकता खड़ी हो गई है।.

 

एक ओर जहां पश्चिमी संस्कृति के घातक प्रभाव से देश की सभ्य संस्कृति खतरे में पड़ रही है, जो एक बहुत ही गंभीर मामला है, वहीं मानवीय मूल्यों, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना भी अत्यंत कठिन होता जा रहा है, जो कि एक कठिन कार्य है। आने वाली पीढ़ियों के लिए कपरा चढ़ाण हो सकता है।

 

ओर जहाँ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संवारने की जगह प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट, जीवों का विनाश और साथ ही आदिवासियों का सामूहिक विस्थापन जैसी कई समस्याएं पैदा होती जा रही है। तब आदिवासी जीवन शैली, आदिवासी जीवन दर्शन, कला, शिल्प, बोलियाँ, भाषा, गीत, संगीत, आदिवासी वाद्ययंत्र, आदिवासी नृत्य, सभी पुराने जमाने की कहानी समान प्रतीत बन जाएगा यह बढ़ी चिंता उपजाने वाली बात हैं।. आदिवासी दिवस को मनाने की घोषणा इस हिसाब से की गई है ताकि दुनिया भर के आदिवासी गाँव, तालुका, जिला, राज्य स्तर पर सुविधा के अनुसार एक साथ आ सकें और दुनिया को अधिक आत्मनिर्भर और बेहतर, स्वस्थ और दीर्घायु जीवन जीने का संदेश दिया जाएं।. विशिष्ट आदिवासी संस्कृति की एक झलक प्राप्त करें। विश्व आदिवासी दिवस समारोह, जो अस्तित्व का संदेश देता है, भारत देश सहित पुरे विश्व में विश्व आदिवासी दिवस बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।.

यहाँ ख़ास बात यह है कि देश के कई आदिवासी बहुल इलाकों में सरकार द्वारा विष्व आदिवासी मनाना शुरू किया ये हमारे लिए बहुत अच्छी बात है पर विश्व आदिवासी दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य प्रकृति संरक्षण और आदिवासी संस्कृति, परंपराएं, आदिवासी पहचान, आदिवासी क्षेत्रों में व्याप्त समस्याएं और इसका समाधान के लिए गहन चिंतन के माध्यम से हल करना है, लेकिन इन सभी चीजों भूलकर विश्व आदिवासी दिवस पर सरकार के कार्यक्रमो में योजनाकिय लाभों तक सीमित रह जाता है जो दुर्भाग्यपूर्ण हैं।

 
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